₹1 करोड़ का इनामी माओवादी मिसिर बेसरा गिरफ्तार: 30 साल तक जंगलों में बचता रहा, इस बार टाटा मैजिक की सवारी बनी गिरफ्तारी की वजह

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रांची : कभी सारंडा और पारसनाथ के घने जंगलों में जिसका नाम सुनते ही सुरक्षा बल हाई अलर्ट पर आ जाते थे, वही भाकपा (माओवादी) का पोलित ब्यूरो सदस्य और ₹1 करोड़ का इनामी मिसिर बेसरा उर्फ सुनीर्मल उर्फ भास्कर उर्फ सागर उर्फ प्रधान अब पुलिस की गिरफ्त में है। करीब तीन दशक तक माओवादी संगठन के सबसे बड़े रणनीतिकारों में गिने जाने वाले ‘सागर‘ को इस बार जंगलों में नहीं, बल्कि एक साधारण टाटा मैजिक वाहन में सफर के दौरान गिरफ्तार किया गया। इस गिरफ्तारी को झारखंड में माओवादी नेटवर्क के खिलाफ अब तक की सबसे बड़ी सफलताओं में से एक माना जा रहा है।

चारों तरफ घेराबंदी हुई और खत्म हुआ ‘ऑपरेशन सागर‘

सूत्रों के मुताबिक धनबाद जिले के बरवाड़ा थाना क्षेत्र में मिसिर बेसरा अपने चार सहयोगियों के साथ ठिकाना बदलने के लिए टाटा मैजिक से जा रहा था। उसकी गतिविधियों की सटीक जानकारी पहले ही झारखंड पुलिस और सीआरपीएफ को मिल चुकी थी। जैसे ही वाहन तय स्थान पर पहुंचा, संयुक्त टीम ने चारों ओर से घेराबंदी कर दी। कुछ ही मिनटों में वर्षों तक सुरक्षाबलों को चुनौती देने वाला शीर्ष माओवादी नेता गिरफ्तार कर लिया गया।

गिरफ्तार किए गए पांच माओवादी

मिसिर बेसरा – पोलित ब्यूरो सदस्य (PBM)

तुम्बा मांझी – रीजनल कमेटी सदस्य (RCM)

बिरेन हांसदा – एरिया कमेटी सदस्य (ACM)

मंगल मुर्मू

दिनेश राय

वाहन से मिलीं तीन AK-47 राइफलें

तलाशी के दौरान टाटा मैजिक से तीन AK-47 राइफलें बरामद हुईं। शुरुआती जांच में माना जा रहा है कि यह दल किसी नए सुरक्षित ठिकाने की ओर जा रहा था। बरामद हथियारों से संकेत मिलता है कि संगठन अब भी अपनी सशस्त्र क्षमता बनाए रखने की कोशिश कर रहा था।

जिस जंगल को बनाया था ढाल, वहीं मिली सबसे बड़ी हार

सबसे दिलचस्प बात यह रही कि जिस इलाके के आसपास उसका पैतृक गांव है, उसी क्षेत्र में उसकी गिरफ्तारी हुई। वर्षों तक जंगलों को अपनी सबसे मजबूत सुरक्षा मानने वाला ‘सागर‘ इस बार खुफिया तंत्र और सुरक्षाबलों की रणनीति के सामने टिक नहीं सका।

30 साल तक रहा माओवादी गतिविधियों का बड़ा चेहरा

मिसिर बेसरा करीब तीन दशक तक झारखंड, बिहार और पश्चिम बंगाल में माओवादी गतिविधियों का प्रमुख चेहरा रहा। उस पर सुरक्षा बलों पर हमले, हथियारों की सप्लाई, रंगदारी वसूली, संगठन विस्तार और कई बड़े नक्सली अभियानों की रणनीति तैयार करने के आरोप हैं। लंबे समय तक वह सुरक्षा एजेंसियों की मोस्ट वांटेड सूची में सबसे ऊपर रहा।

पूछताछ में खुल सकते हैं कई बड़े राज

सुरक्षा एजेंसियों का मानना है कि मिसिर बेसरा से पूछताछ के दौरान माओवादी संगठन के भूमिगत नेटवर्क, हथियारों की सप्लाई चेन, फंडिंग, शीर्ष नेतृत्व, सक्रिय कैडरों और कई पुराने नक्सली हमलों से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारी सामने आ सकती है। इससे संगठन के बचे हुए ढांचे पर भी बड़ा असर पड़ने की संभावना है।

झारखंड के नक्सल विरोधी अभियान की बड़ी सफलता

एक समय सारंडा, पारसनाथ और झारखंड का बड़ा इलाका माओवादी प्रभाव का मजबूत गढ़ माना जाता था। अब वही संगठन अपने बड़े नेताओं को लगातार खोता दिखाई दे रहा है। ₹1 करोड़ के इनामी पोलित ब्यूरो सदस्य की गिरफ्तारी को झारखंड पुलिस, सीआरपीएफ और केंद्रीय एजेंसियों के लंबे समय से चल रहे संयुक्त अभियान, मजबूत खुफिया तंत्र और लगातार बनाए गए दबाव का बड़ा परिणाम माना जा रहा है।

अश्विन था मिसिर बेसरा का सबसे भरोसेमंद साथी

अश्विन उर्फ लच्छू कोरसा लंबे समय तक भाकपा (माओवादी) के जोनल कमेटी सदस्य के रूप में सक्रिय रहा। संगठन के विस्तार, नई भर्ती, रणनीति तैयार करने और सारंडा क्षेत्र में माओवादी गतिविधियों को मजबूत करने में उसकी अहम भूमिका मानी जाती रही है। सुरक्षा एजेंसियों के अनुसार, वह केवल हथियारों के दम पर ही नहीं, बल्कि अपने प्रभावशाली संवाद और बहकावे के जरिए युवाओं को संगठन से जोड़ने में भी माहिर था।

इस आत्मसमर्पण की सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि अश्विन की पत्नी सुबनी, जो संगठन की सक्रिय सदस्य रही है, उसने भी हथियार छोड़ दिए हैं। इसके अलावा एरिया कमेटी सदस्य सोहन पुनेम की पत्नी जेलानी भी आत्मसमर्पण करने वालों में शामिल है। इसे माओवादी संगठन के पारिवारिक और स्थानीय नेटवर्क के तेजी से कमजोर पड़ने का संकेत माना जा रहा है।

विधायक पर हमले में भी आया था नाम

अश्विन का नाम 4 जनवरी 2022 को पश्चिमी सिंहभूम के टोंटो थाना क्षेत्र में खेलकूद प्रतियोगिता के दौरान तत्कालीन विधायक गुरुचरण नायक पर हुए जानलेवा हमले में सामने आया था। इस हमले में विधायक की सुरक्षा में तैनात दो पुलिसकर्मी शहीद हुए थे। जांच एजेंसियों ने इस घटना में अश्विन की सक्रिय भूमिका बताई थी।

लगातार दबाव से कमजोर पड़ रहा माओवादी संगठन

सुरक्षा बलों की लगातार घेराबंदी, जंगलों में तेज अभियान, आर्थिक संसाधनों पर नियंत्रण और झारखंड-छत्तीसगढ़ पुलिस की संयुक्त रणनीति का असर अब साफ दिखाई दे रहा है। अनुभवी माओवादी कैडर लगातार आत्मसमर्पण कर रहे हैं। रांची में मंगलवार को 16 नक्सलियों के आत्मसमर्पण के बाद अश्विन जैसे जोनल स्तर के नेता का सरेंडर इस बात का संकेत माना जा रहा है कि कभी अभेद्य समझा जाने वाला सारंडा का लाल किला अब तेजी से कमजोर पड़ रहा है।

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